अज्ञानता के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर केवल आत्मिक विचार.......... जब हम ईश्वर से प्रेम करने लगते हैं तो कोई भी सांसारिक वस्तु इस लायक नहीं प्रतीत होती कि उससे प्रेम किया जाए। जब चातक पक्षी पावस में गिरने वाली ओस की पहली बूंदों का प्यासा हो जाता है तो उसे न तूफान का भय होता है और न बादलों की गर्जना का। इसी तरह साधक भी यदि एक बार ईश्वर के सानिध्य का स्वाद चख ले तो फिर उसे संसार में बाकी सब चीजें फीकी और बेस्वाद जान पड़ती हैं। सांसारिक लाभ-हानि के समीकरण धुंधले पड़ जाते हैं।
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